

एम्स ऋषिकेश की बड़ी लापरवाही का खुलासा हुआ है। करीब 12 साल पुराने एक मामले में उत्तराखंड राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एम्स ऋषिकेश की अपील को खारिज कर दिया है। मामला एक मरीज को मेडिकल रिकॉर्ड में एचआईवी पॉजिटिव बताए जाने और बाद में दूसरे अस्पतालों में उसकी रिपोर्ट निगेटिव आने से जुड़ा है।
आयोग ने जिला उपभोक्ता आयोग के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें मरीज को 50 हजार रुपये मुआवजा और 10 हजार रुपये मुकदमे के खर्च के रूप में देने के आदेश दिए गए थे। मामला वर्ष 2014 का है। बीमारी के इलाज के लिए मरीज एम्स ऋषिकेश में भर्ती हुआ था। डिस्चार्ज के बाद उसके मेडिकल दस्तावेजों में एचआईवी पॉजिटिव दर्ज होने की बात सामने आई। गंभीर बीमारी का नाम सामने आने के बाद मरीज ने दोबारा जांच कराने का फैसला लिया।
देहरादून के दो भिन्न अस्पतालों में एचआईवी जांच रिपोर्ट निगेटिव आने पर मरीज ने एम्स अस्पताल के खिलाफ उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया और मेडिकल रिकॉर्ड में गलत जानकारी दर्ज करने से मानसिक और सामाजिक परेशानी होने का आरोप लगाया।
वर्ष 2019 में हरिद्वार जिला उपभोक्ता आयोग ने एम्स ऋषिकेश को 50 हजार रुपये मुआवजा और 10 हजार रुपये मुकदमे के खर्च के रूप में देने का आदेश दिया था।
एम्स ऋषिकेश ने इस फैसले को राज्य उपभोक्ता आयोग में चुनौती दी। एम्स की ओर से दलील दी गई कि उस समय संस्थान में एचआईवी की पुष्टि करने के लिए आवश्यक परीक्षण की सुविधा उपलब्ध नहीं थी और अस्पताल ने मरीज का एचआईवी टेस्ट कर उसे पॉजिटिव घोषित नहीं किया था।राज्य उपभोक्ता आयोग ने मेडिकल रिकॉर्ड में एचआईवी पॉजिटिव लिखे होने और मरीज को संबंधित उपचार लेने की सलाह दिए जाने को महत्वपूर्ण माना। आयोग ने पूछा,यदि की जांच या उसका निदान नहीं किया गया था, तो मेडिकल रिकॉर्ड में एचआईवी पॉजिटिव का उल्लेख किस आधार पर किया गया।
आयोग ने माना कि एचआईवी जैसी गंभीर बीमारी से संबंधित जानकारी मेडिकल रिकॉर्ड में दर्ज करते समय अत्यधिक सावधानी बरती जानी चाहिए।
17 अगस्त 2026 को राज्य उपभोक्ता आयोग ने एम्स ऋषिकेश की अपील खारिज करते हुए जिला आयोग के आदेश को बरकरार रखा। अब एम्स ऋषिकेश को मरीज को कुल 60 हजार रुपये का भुगतान करना होगा।
एम्स ऋषिकेश की जनसंपर्क अधिकारी सिलोए मोहंती ने कहा कि मामला वर्ष 2014 का है और मरीज की डिस्चार्ज समरी में एक आई वी पॉजिटिव लिखा गया था। राज्य उपभोक्ता आयोग ने 60 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। उन्होंने कहा कि एम्स की लीगल टीम इस आदेश के खिलाफ न्यायालय में आगे की कानूनी कार्रवाई करेगी।यह मामला सिर्फ मुआवजे तक सीमित नहीं है, बल्कि मेडिकल रिकॉर्ड में गंभीर बीमारियों से जुड़ी जानकारी दर्ज करने में बरती जाने वाली सावधानी पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है। क्योंकि मेडिकल रिकॉर्ड में दर्ज एक गलत जानकारी किसी मरीज के मानसिक और सामाजिक जीवन पर कितना गहरा असर डाल सकती है। सवाल खड़े करता विषय चिंतनीय है

