*आईसीएआर–आईआईएसडब्ल्यूसी देहरादून में एकीकृत जल संसाधन मॉडलिंग एवं बेसिन प्रबंधन पर राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यशाला का शुभारंभ*
– एकीकृत जल संसाधन मॉडलिंग एवं बेसिन प्रबंधन पर दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला 7–8 सितंबर, 2026 को आयोजित
– प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए 29 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के 98 जिलों से लगभग 400 प्रतिभागियों ने पंजीकरण कराया
– विशेषज्ञों ने खंडित वाटरशेड-स्तरीय हस्तक्षेपों से आगे बढ़कर एकीकृत नदी बेसिन प्रबंधन की दिशा में परिवर्तन पर दिया जोर
– कार्यशाला में बेसिन के आंकड़ों एवं मॉडलिंग को व्यावहारिक जल प्रबंधन संबंधी निर्णयों में परिवर्तित करने के लिए MIKE HYDRO Basin के उपयोग पर ध्यान
– देशभर से वैज्ञानिक, शोधकर्ता, विद्यार्थी एवं विभिन्न लाइन विभागों के अधिकारी हाइब्रिड माध्यम से कार्यक्रम में भाग ले रहे हैं
आईसीएआर–भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान (आईसीएआर–आईआईएसडब्ल्यूसी), देहरादून में बुधवार को “MIKE HYDRO Basin का उपयोग करते हुए एकीकृत जल संसाधन मॉडलिंग एवं बेसिन प्रबंधन” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यशाला का शुभारंभ हुआ। कार्यशाला 7–8 सितंबर, 2026 को हाइब्रिड माध्यम से आयोजित की जा रही है। इसका आयोजन “बूढ़ी गंडक बेसिन के जल संसाधनों पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव” परियोजना के अंतर्गत किया जा रहा है, जिसे भारत सरकार के जल शक्ति मंत्रालय के आईएनसीसीसी द्वारा सहयोग प्रदान किया गया है। साथ ही, उत्तराखंड की स्प्रिंग एंड रिवर रिजुवेनेशन अथॉरिटी (SARRA) द्वारा वित्तपोषित कमल गंगा नदी पुनर्जीवन परियोजना के अंतर्गत भी इसका आयोजन किया जा रहा है।
प्रशिक्षण कार्यक्रम आईसीएआर–आईआईएसडब्ल्यूसी, देहरादून; स्प्रिंग एंड रिवर रिजुवेनेशन अथॉरिटी (SARRA), उत्तराखंड; तथा डीएचआई इंडिया द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया जा रहा है। कार्यशाला की थीम “MIKE HYDRO Basin के माध्यम से बेसिन आंकड़ों से जल प्रबंधन संबंधी निर्णयों तक” है।आईसीएआर–आईआईएसडब्ल्यूसी, देहरादून के प्रमुख एवं प्रधान वैज्ञानिक तथा कार्यशाला के कार्यक्रम निदेशक डॉ. अंबरीश कुमार ने एकीकृत जल संसाधन मॉडलिंग एवं बेसिन स्तर पर प्रबंधन के क्षेत्र में वैज्ञानिक एवं तकनीकी क्षमता विकसित करने के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि यह कार्यशाला शोधकर्ताओं, वैज्ञानिकों, विद्यार्थियों और विभिन्न लाइन विभागों के अधिकारियों को यह समझने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान करती है कि बेसिन के आंकड़ों एवं मॉडलिंग उपकरणों को किस प्रकार व्यावहारिक जल प्रबंधन संबंधी निर्णयों में प्रभावी ढंग से परिवर्तित किया जा सकता है। उन्होंने विशेष रूप से SARRA के ‘वन डिस्ट्रिक्ट–वन रिवर’ कार्यक्रम के संदर्भ में इसकी महत्ता पर प्रकाश डाला।
डॉ. कुमार ने बताया कि कार्यशाला को देशभर से उत्साहजनक प्रतिक्रिया मिली है और लगभग 400 प्रतिभागियों ने पंजीकरण कराया है। कार्यक्रम में 29 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के 98 जिलों से प्रतिभागी शामिल हो रहे हैं। इनमें विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, सरकारी विभागों, अनुसंधान संगठनों तथा अन्य एजेंसियों के प्रतिनिधि शामिल हैं। महाराष्ट्र, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, केरल और उत्तर प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों के प्रतिभागियों ने कार्यक्रम के लिए पंजीकरण कराया है। राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (NIH), रुड़की; केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान (CSSRI), करनाल; तथा DHI के वरिष्ठ विशेषज्ञ प्रशिक्षण कार्यक्रम में संसाधन व्यक्तियों के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
उन्होंने जल संसाधनों पर बढ़ते दबाव तथा जलवायु परिवर्तन एवं जलवायु परिवर्तनशीलता के उभरते प्रभावों को देखते हुए खंडित वाटरशेड-स्तरीय हस्तक्षेपों से आगे बढ़कर एकीकृत बेसिन-स्तरीय दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
कार्यशाला में मुख्य अतिथि के रूप में प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए डॉ. ए.के. डिमरी, संयुक्त निदेशक, वाटरशेड प्रबंधन, वाटरशेड प्रबंधन निदेशालय, उत्तराखंड ने हाल की फ्लैश फ्लड की घटनाओं तथा वाटरशेड विकास एवं प्रबंधन गतिविधियों से जुड़ी जलवायु परिवर्तन संबंधी चुनौतियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने अधिक प्रभावी एवं टिकाऊ परिणामों के लिए वाटरशेड संबंधी हस्तक्षेपों को नदी बेसिन स्तर पर किए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
विशिष्ट अतिथि डॉ. डी.एस. रावत ने जल संसाधनों एवं नदी प्रणालियों से जुड़ी चुनौतियों के समाधान के लिए आईसीएआर–आईआईएसडब्ल्यूसी और SARRA के बीच संस्थागत सहयोग के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि नदी पुनर्जीवन के लिए नदी और उसके जलग्रहण क्षेत्र की समग्र समझ आवश्यक है, जिसे वैज्ञानिक आकलन, क्षेत्रीय हस्तक्षेपों और समन्वित योजना का समर्थन प्राप्त हो।
डॉ. चरण सिंह, प्रभारी निदेशक, आईसीएआर–आईआईएसडब्ल्यूसी, देहरादून ने मृदा एवं जल संरक्षण, वाटरशेड विकास तथा प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन के क्षेत्र में संस्थान के महत्वपूर्ण योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों के सतत प्रबंधन के लिए वैज्ञानिक एवं तकनीकी दृष्टिकोण अपनाने के महत्व पर जोर दिया और देश के विभिन्न हिस्सों से विशेषज्ञों एवं प्रतिभागियों को एक मंच पर लाने की इस पहल की सराहना की।
मुख्य वक्ता डॉ. आर.पी. पांडे, पूर्व प्रमुख एवं वैज्ञानिक-जी, राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (NIH), रुड़की ने नदी पुनर्जीवन के क्षेत्र में अपने व्यावहारिक अनुभव साझा किए। उन्होंने देहरादून की रिस्पना नदी से जुड़े पुनर्जीवन कार्य के अनुभवों और उससे प्राप्त महत्वपूर्ण जानकारियों को भी प्रतिभागियों के साथ साझा किया।
उद्घाटन सत्र में डॉ. उदय मंडल, डॉ. रमा पाल, डॉ. वेंकटेश तथा अभियंता एच.एस. भाटिया सहित अन्य प्रतिभागी एवं विशेषज्ञ भी उपस्थित रहे।
कार्यशाला का उद्देश्य एकीकृत जल संसाधन योजना, नदी पुनर्जीवन तथा सतत बेसिन प्रबंधन के लिए वैज्ञानिक मॉडलिंग उपकरणों के उपयोग को बढ़ावा देने और तकनीकी क्षमता को सुदृढ़ करना है।